Saturday, November 27, 2021
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किसान आंदोलन क्या है |in Hindi

किसान आंदोलन:-

परिचय

  • किसान अपनी मांगों के लिये प्रत्यक्ष तौर पर लड़ते हुए मुख्य शक्ति के रूप में उभरे।
  • वर्ष1858 और वर्ष 1914 के बीच की अवधि में आंदोलनों की प्रवृत्ति वर्ष 1914 के बाद के आंदोलनों के विपरीत, स्थानीयकृत, असंबद्ध और विशेष शिकायतों तक सीमित थी।

आंदोलनों का कारण:

  • किसान अत्याचार: ज़मींदारी क्षेत्रों में किसानों को उच्च लगान, अवैध करारोपण, मनमानी बेदखली और अवैतनिक श्रम का सामना करना पड़ा। इसके अलावा सरकार ने भारी भू-राजस्व भी लगाया।
  • भारतीय उद्योगों को बड़े पैमाने पर नुकसान: आंदोलनों का उदय तब हुआ जब ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप पारंपरिक हस्तशिल्प और अन्य छोटे उद्योगों का दमन हुआ, जिससे स्वामित्व में परिवर्तन हुआ तथा किसानों पर कृषि भूमि का अत्यधिक बोझ एवं कर्ज बढ़ा एवं किसानों की गरीबी में वृद्धि हुई।
  • प्रतिकूल नीतियाँ: ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियाँ ज़मींदारों और साहूकारों के पक्ष में थीं तथा किसानों का शोषण करती थीं। इस अन्याय के खिलाफ किसानों ने कई अवसरों पर विद्रोह भी किया।

किसान आंदोलन  किसानों के बीच एकता: किसानों में गैर-भेदभाव और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की सर्वव्यापी प्रकृति के कारण किसान आंदोलन भूमिहीन मज़दूरों एवं सामंतवाद-विरोधी किसानों के सभी वर्गों को एकजुट करने में सक्षम रहा।

किसान आंदोलन क्या है

किसान आंदोलन किसानों ने कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन शुरू किया।

26 नवंबर, 2020
यही वह तारीख थी जब किसानों ने कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन शुरू किया। हालांकि इसकी भूमिका काफी पहले से बननी शुरू हो गई थी। 4 सितंबर को सरकार ने संसद में किसान कानूनों संबंधी ऑर्डिनेंस पेश किया। 17 सितंबर को यह ऑर्डिनेंस लोकसभा में पास हो गया। इसके बाद 20 सितंबर को राज्यसभा में भी इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके बाद ही देशभर में किसान मुखर होने लगे। 24 सितंबर को पंजाब में तीन दिन के लिए रेल रोको आंदोलन शुरू हुआ। वहीं 25 सितंबर को ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी की पुकार देशभर के किसान दिल्ली के लिए निकल पड़े। उसी साल 25 नवंबर को देशभर में नए किसान कानूनों का विरोध शुरू हो गया। पंजाब और हरियणा में दिल्ली चलो मूवमेंट का नारा दिया गया।

26 जनवरी, 2021
किसान संगठनों ने कृषि कानूनों के विरोध में गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड बुलाई थी। इस दौरान हजारों प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ मुठभेड़ हो गई। परेड के दौरान सिंघु और गाजीपुर बॉर्डर के किसानों ने अपना रूट बदल दिया और दिल्ली आईटीओ व लाल किला का रुख कर लिया। यहां पर प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज हुआ। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। 28 जनवरी को दिल्ली गाजीपुर बॉर्डर पर भी तनाव फैला। इसकी वजह थी पड़ोसी राज्य यूपी के गाजियाबाद के जिला प्रशासन का बॉर्डर खाली करने का आदेश। 

सितंबर, अक्टूबर, नवंबर 2021
यूपी चुनावों को करीब देखकर किसानों ने यहां अपना अपना मूवमेंट शुरू किया। मुजफ्फरनगर में बड़ी संख्या में लोग जुटे। इसके बाद 7 से 9 नवंबर के बीच किसान करनाल पहुंचे। 11 सितंबर को किसान और करनाल जिला प्रशासन के बीच गतिरोध खत्म हुआ। इसके बाद तमाम प्रतिरोधों-अवरोधों के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को संबोधित करते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया।

11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्यों की एक कमेटी बनाई जिन्हें सरकार और किसानों से बात करके एक रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया.

जिसमें भारतीय किसान यूनियन के भूपिंदर सिंह मान, शेतकारी संगठन के अनिल घनवत, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और डॉक्टर प्रमोद कुमार जोशी को शामिल किया गया.

लेकिन जैसे ही ये नाम सामने आए इस कमेटी को लेकर बहस छिड़ गई. दरअसल, ये सभी लोग अतीत में सरकार के कृषि कानूनों के समर्थन में अपनी राय रख चुके थे. ऐसे में में बहस छिड़ गई कि आखिर ये कमेटी निष्पक्ष कैसे हो सकेगी.

विवाद और आलोचनाएं बढ़ी तो भूपिंदर सिंह मान ने खुद को इस कमेटी से अलग कर लिया और किसानों के प्रति समर्थन व्यक्त किया. अब इस कमेटी में रह गए सिर्फ तीन लोग.

15 मार्च 2021 को इस कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश की. बीबीसी ने किसान यूनियन के नेता दर्शनपाल सिंह से इस बारे में बात की|

साल भर से भी ज्यादा समय हो गया है नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों को पारित किए हुए. लेकिन उनके खिलाफ जारी प्रतिरोध आंदोलन आज के भारत में एक व्यापक और सतत विरोध आंदोलनों में से एक रहा है. अपनी व्यापकता और दृढ़ता के साथ यह आंदोलन विभिन्न समूहों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया और इससे सभी की अपनी-अपनी उम्मीदें रही हैं. इनमें से कई तो उन मुद्दों से संबंधित हैं जो कभी भी आंदोलन का हिस्सा नहीं थे. सरकार की विराट प्रचार मशीनरी, जिसमें मुख्यधारा की लगभग सारी मीडिया शामिल है, ने इन उम्मीदों को हवा दी और हर गलती को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया और आंदोलन और सहभागी समूहों के बीच दरार को चौड़ा करने का काम किया. इसने आंदोलनों को ऐसी कसौटी पर रख दिया जिसे अमल में लाना मुमिकन ही नहीं है.

कृषि कानूनों के खिलाफ़ किसानों का ये आंदोलन असल में सितंबर, 2020 से ही पंजाब और हरियाणा में जारी था लेकिन जब किसानों को लगा कि उनकी बात दिल्ली तक नहीं पहुंच पा रही तो नवंबर के आख़िर में किसान दिल्ली के लिए कूच कर गए.

बीते छह महीने के अरसे में किसानों ने सड़कों पर लगे तंबुओं और ट्रॉलियों को अपना घर बना लिया है. ये आज़ाद भारत का सबसे बड़ा और लंबा किसान आंदोलन है लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई, छह महीनों में आंदोलन के क्या- क्या अहम पड़ाव रहे

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