Home कोरोनावायरस ब्लैक, व्हाइट, यलो फ़ंगस क्या हैं जानिए और इन्हें कैसे पहचानें

ब्लैक, व्हाइट, यलो फ़ंगस क्या हैं जानिए और इन्हें कैसे पहचानें

  • ब्लैक, व्हाइट, यलो फ़ंगस के बारे मे जाने क्या करे क्या सावधानिया बरते.
  • मौजूदा समय में मामले बढ़ने की एक बड़ी वजह कोरोना वायरस संक्रमण है. म्यूकरमायकोसिस के सबसे ज़्यादा मामले कोरोना के मरीज़ों में सामने आ रहे हैं, चाहे वो ठीक हो चुके हों या नहीं.
  • जिन मरीज़ों को डायबिटीज़ है और इलाज के लिए स्टेरॉइड दिए गए हैं उन्हें इसका सबसे ज़्यादा ख़तरा है. लेकिन, बिना डायबिटिक कोरोना मरीज़ों को भी अगर स्टेरॉइड दिए गए हैं तो उनमें भी म्यूकरमायकोसिस हुआ है.
  • फ़ंगल इंफ़ेक्शन का ख़तरा उनमें भी है जिनका कोई ट्रांसप्लांट किया गया है. इसके अलावा कैंसर के मरीज़ जिनकी कीमोथेरेपी चल रही हो या जो डायलिसिस पर हों, इन सभी की इम्यूनिटी कमज़ोर होती है.

स्टेरॉइड्स के इस्तेमाल से कोविड-19 में फेफड़ों में सूजन को कम किया जाता है. वहीं, जब शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली (इम्यून सिस्टम) कोरोना वायरस से लड़ने के लिए अति-सक्रिय हो जाती है तब भी स्टेरॉइड शरीर को नुक़सान होने से रोकने में मदद करते हैं.

ये इम्युनिटी को कमज़ोर करते हैं और डायबिटीज़ या बिना डायबिटीज़ वाले मरीज़ों में शुगर का स्तर बढ़ा देते हैं जिससे फ़ंगल इंफ़ेक्शन हो सकता है.

फ़ंगल इंफ़ेक्शन के शरीर पर अलग-अलग प्रभाव होते हैं. इनके इलाज के लिए ज़रूरी है कि समय पर इनकी पहचान हो जाए. इसके लिए इनके लक्षणों के समझना ज़रूरी है.

म्यूकरमायकोसिस यानी ब्लैक फ़ंगस

म्यूकरमायकोसिस म्यूकर या रेसजोपस फ़ंगस के कारण होता है जो आमतौर पर मिट्टी, पौधों, खाद, सड़े हुए फल और सब्ज़ियों में पनपता है.

ये फ़ंगस साइनस, दिमाग़ और फेफड़ों को प्रभावित करती है और बहुत कम मामलों में गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक (इसमें पाचन तंत्र के सभी अंग शामिल होते हैं) में भी पाई जा सकती है.

इसमें ऑपरेशन की भी ज़रूरत पड़ सकती है. कई मामलों में देर हो जाने पर इंफ़ेक्शन रोकने के लिए आंख या जबड़ा भी निकालना पड़ता है.

डॉक्टर्स के मुताबिक़, अगर ये इंफ़ेक्शन फेफड़ों या गेस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक में होता है तो ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि इसके लक्षण देर से सामने आते हैं. म्यूकरमायकोसिस में मृत्यु दर 50 प्रतिशत तक होती है.

इसके लक्षण हैं- नाक बंद हो जाना, नाक से ख़ून या काला तरल पदार्थ निकलना, सिरदर्द, आंखों में सूजन और दर्द, पलकों का गिरना, धुंधला दिखना और आख़िर में अंधापन होना. नाक के आसपास काले धब्बे हो सकते हैं और सेंसशन कम हो सकता है. जब फेफड़ों में इसका इंफ़ेक्शन होता है तो सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण होते हैं.

म्यूकर सेप्टिकस

ब्लैक फ़ंगस कोरोना की तरह नहीं फैलता: डॉ. रणदीप गुलेरियाये म्यूकरमायकोसिस का ही एक प्रकार है. म्यूकरमायकोसिस कई तरह के होते हैं. इसमें बुख़ार, नाक से लाल या काले रंग का रिसाव, कमज़ोरी और नाक के आसपास सेंसेशन कम होना जैसे लक्षण आते हैं.

कैनडिडा यानी व्हाइट फ़ंगस

कमज़ोर इम्यूनिटी वाले, डायबिटिक या बिना डायबिटिक और आईसीयू में लंबे समय तक रहे मरीज़ों में इसका ख़तरा होता है.

  • इसमें सफ़ेद पैच आ जाते हैं. जीभ पर सफ़ेद दाग दिखने लगते हैं. किडनी और फेफड़ों में ये इंफ़ेक्शन हो सकता है. ये म्यूकरमायकोसिस जितना ख़तरनाक नहीं होता. इसमें मृत्युदर 10 प्रतिशत के क़रीब है. ये तभी ख़तरनाक होता है अगर इंफ़ेक्शन ख़ून में आ जाए.

एसपरजिलस फ़ंगल इंफ़ेक्शन

ये भी कोरोना के मरीज़ों में देखा गया है. हालांकि, मामले बहुत ही कम हैं. ये भी फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है. इसमें फेफड़ों में कैविटी बन जाती है.

भारत में कोरोना की दूसरी लहर का पीक आ चुका है?ये ज़्यादातर उनमें होता है जिन्हें पहले से कोई एलर्जी हो. इसमें भी अगर निमोनिया हो जाए या फ़ंगल बॉल बन जाए तो ये ख़तरनाक हो सकता है.

कैसे हो बचाव

इन सभी फ़ंगल इंफ़ेक्शन से बचने के लिए ज़रूरी है कि साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखा जाए तथा स्वच्छ वातावरण मे रहन सहन अपनाया जाए, कोरोना से ठीक होने के बाद मरीज़ धूल-मिट्टी वाली जगहों पर जाने से बचें.

एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया कि साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है. जैसे हाथ धोना, ऑक्सीजन की ट्यूब साफ़ रखना, ऑक्सीजन सपोर्ट के लिए इस्तेमाल होने वाला पानी स्टेरलाइज्ड हो तो बेहतर है.

डॉक्टर राहुल भार्गव कहते हैं कि आगे इलाज में ध्यान रखा जाएगा कि कोरोना का इलाज करा रहे मरीज़ों में शुगर लेवल को नियंत्रित रखा जाए और स्टेरॉइड का इस्तेमाल संभलकर हो. जो लोग कोरोना का इलाज करा रहे हैं, जिनमें कोरोना ठीक हो चुका है या जिनकी इम्युनिटी किसी अन्य बीमारी के कारण कमज़ोर है, वो फ़ंगल इंफ़ेक्शन के लक्षण दिखते ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें.

फ़िलहाल देश में म्यूकरमायकोसिस के नौ हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं लेकिन कैडिडा और एसपरजिलस के मामले बहुत कम हैं.

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